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आधुनिकता की ‘बयार’ में लोक-कलाकार

नई दिल्ली: अलिफ़ थिएटर द्वारा ‘बयार’ नाटक का मंचन एलटीजी सभागार, मंडी हाउस में किया गया जिसके निर्देशक रौनक खान थे| इसके पहले इन्होनें खोज-बिहान, हवालात, खुदा हाफ़िज़ आदि नाटकों का सफल निर्देशन किया है। नाटक ‘पिया बहरूपिया’ से भी जुड़े रहे और इस नाटक का चीन, ऑस्ट्रेलिया, ताइवान, जैसे देशों में मंचन किया|

“बयार” जिसका मतलब होता है-हवा| यह कहानी प्रमुख रूप से पूर्वांचल के आजमगढ़ जिले से शुरू होती है इसलिए लोक भाषा का भी प्रयोग बहुत सुन्दर तरीके से किया गया है| इस नाटक में एक ऐसे नाचने गाने वाली मण्डली और कलाकारों की कहानी है, जो भावनात्मक रूप से लोक कलाओं, पारम्परिक विधाओं से जुड़े हैं|

भावनात्मक इसलिए क्योंकि भावना और संबन्धो के इतर इनके पास कुछ है भी नहीं, शायद इसीलिए मण्डली ही इनके लिए एकमात्र ठीहा (अड्डा) है, नाच-गाने के अलावा यह लोग और कुछ कर भी नहीं सकते हैं| शायद उन्हें आभास भी नहीं था की भविष्य में इनकी मण्डली, और ये विधाएं ऐसे बिखर जाएंगी जैसे पतझड़ मे पेड़ से गिरे सूखे पत्तों को कोई चहल दे।आधुनिकता और वैज्ञानिकता ने सभी ओर अपना प्रभाव दिखाया तो फिर यह क्षेत्र कैसे अधुरा रह सकता था|

परम्परागत नाच – गानों की जगह आधुनिक गाजे बाजे, सीडी, ब्रास बैंड, डीजे, इत्यादि ने ले लिया फिर क्या था परम्परागत लोक कलाकार बेरोजगार हो गए और फिर मंडली छोड़ अन्य कामों में लग गए , किसी ने मोची की दुकान खोली तो कोई ईट भठ्टो पर काम करने लगा , तो कोई खेत में मजदूरी करने लगा , तो कोई आधुनिक ब्रास बैंड में रहना ही भला समझा| इस तरह पुरानी लोक कलाएं तो विलुप्त होतीं ही गयी , इससे जुड़े लोग बेरोजगार भी हो गए| यही कहानी है ‘बयार’ की, आधुनिकता की बयार जिसने सब कुछ बदल दिया|

इस नाटक में प्रमुख रूप से नेपाल गौतम , मनोज पंडित, दिव्यांशु सिंह, अभिमन्यु, आकाश सिंह, रमा शर्मा, मनीषा, मेहरीन शबा, सलीम, मोहित, दीपक, रवि, प्रियांश इत्यादि शामिल रहे और अपने सशक्त अभिनय से नाटक को जीवंत बना दिया| प्रकाश प्रबंध और संगीत बहुत ही बेहतरीन थे| लोकगीतों के माध्यम से भोजपुरी भाषा की मिठास भी महसूस हुयी|

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