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देश में ‘हेट इन इंडिया’, बाहर ‘मेक इन इंडिया’ नहीं चल सकता : थरूर

 

देबायन मुखर्जी,

कोलकाता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कूटनीति में काफी ‘निजी ऊर्जा’ खर्च की है, लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि देश में ‘हेट इन इंडिया’ को बढ़ावा देकर बाहर ‘मेक इन इंडिया’ का प्रचार कठिन है। यह कहना है पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर का।

 

मजे हुए कूटनीतिज्ञ थरूर के अनुसार, मोदी की विदेश नीति इस अवधारणा पर आधारित है कि ‘विक्रेता एक खाली डिब्बा बेचने का प्रयास कर रहा है।’

 

थरूर, अपनी किताब ‘एन एरा ऑफ डार्कनेस’ के प्रचार के लिए कोलकाता आए थे। इसी दौरान उन्होंने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में कहा, “उन्होंने अपनी कूटनीति में अपनी काफी ऊर्जा खर्च की है और इससे कोई इंकार नहीं कर रहा। उन्होंने अथक यात्राएं की हैं। वह भारत और भारत के विकास को लेकर अपने दृष्किोण के विक्रेता रहे हैं।”

 

लेखक और कांग्रेसी नेता ने कहा, “लेकिन इसमें दो समस्याएं हैं।”

 

उन्होंने कहा, “पहली यह कि यह धारणा बढ़ती जा रही है कि यह विक्रेता खाली डिब्बा बेच रहा है। देश की वास्तविक स्थिति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। उदाहरण के तौर पर भारतीय निवेशक भारत में अधिक निवेश नहीं कर रहे। हमारे देसी पूंजीवादी अपना पैसा बाहर ले जा रहे हैं। वहीं, श्रीमान मोदी विदेशियों को भारत में निवेश करने के लुभावने आकर्षण बेचने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक असली समस्या है।”

 

केरल के तिरुवनंतपुरम निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सदस्य थरूर ने कहा, “दूसरी समस्या यह है कि कूटनीति में हमेशा एक अंत का कोई रास्ता होना चाहिए। हमारे समय में हम स्पष्ट थे कि हमारी विदेश नीति का मकसद भारत और भारत की जनता के बदलाव और विकास को बढ़ावा देना है।”

 

उन्होंने कहा, “यानी हमारा उन देशों के साथ अच्छा रिश्ता होना चाहिए, जिनसे निवेश आता है, जो हमारी ऊर्जा सुरक्षा के स्रोत्र हैं, जैसे अरब देश, उन देशों के साथ भी हमारे अच्छे संबंध होने चाहिए, जिनसे हमें खाद्य सुरक्षा मिलती है, ऐसे देश जहां भारतीय काम कर रहे हैं, ताकि वे वहां सुरक्षित महसूस करें आदि।”

 

मई 2009 से अप्रैल 2010 के बीच विदेश राज्य मंत्री रहे थरूर ने कहा, “अगर आप देश में ‘हेट इन इंडिया’ को बढ़ावा दे रहे हैं, तो विदेश में ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा दे पाना कठिन है।”

 

थरूर ने कहा कि कांग्रेस और भाजपा में बुनियादी मतभेद राष्ट्रवाद को लेकर उनकी अलग-अलग विचारधाराओं के कारण है। कांग्रेस धर्म और भाषा का भेद किए बगैर सभी को गले लगाने वाली समग्रता में विश्वास करती है, जबकि भाजपा एक संकीर्ण विचारधारा का प्रचार कर रही है, जो सभी को स्वीकार्य नहीं है।

 

उन्होंने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सत्तारूढ़ दल संकीर्ण विचारधारा वाले राष्ट्रवाद को प्राथमिकता देता है, जो भारत को केवल एक विशेष समुदाय, यानी हिंदू समुदाय तक सीमित करता है और उसमें भी हिंदुत्व की एक विशेष विचारधारा तक, जो हर किसी को स्वीकार्य नहीं हो सकता। उदाहरण के तौर पर दलित इस विचारधारा से सहमत नहीं होंगे।”

 

थरूर ने कहा, “किसी को राष्ट्रवादी कहना और दूसरे को नहीं मूर्खतापूर्ण है। ये सभी राष्ट्रवाद के भिन्न प्रकार हैं। एक समावेशी राष्ट्रवाद है और दूसरा संकीर्ण मानसिकता वाला राष्ट्रवाद और इस समय दूसरा सत्ता में है। कुछ लोग इस प्रकार के राष्ट्रवाद से खुद को कटा हुआ महसूस कर रहे हैं। मुझे लगता है कि यह एक खतरनाक स्थिति है।”

 

संयुक्त राष्ट्र में काफी समय बिता चुके थरूर 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की दौड़ में भी शामिल थे, जिसमें अंतत: बान की-मून को जीत हासिल हुई थी। थरूर कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति के उदय के मुद्दे में अधिक नहीं पड़ना चाहते।

 

उन्होंने कहा, “उदाहरण के तौर पर फ्रांस में मरीन ला पेन ने चुनाव में करीब 30 प्रतिशत मत हासिल किया है, लेकिन अभी भी 70 प्रतिशत उनकी राजनीति के खिलाफ हैं और इसकी संभावना नहीं दिखती कि वह राष्ट्रपति चुनाव जीत जाएंगी।”

 

थरूर ने कहा, “हॉलैंड में गीर्त वाइल्डर्स भले ही एक लोकप्रिय हस्ती बन गए हैं, लेकिन वह बहुमत हासिल नहीं कर पाएंगे। ब्रेक्सिट आप्रवासी-विरोधी मत का नतीजा है। इसी प्रकार डोनाल्ड ट्रंप की जीत कुछ हद तक जीनोफोबिया यानी अमेरिका में बाहरी लोगों का विरोध करने का परिणाम है। ये सभी बातें सही हैं, लेकिन हर देश की राजनीति में उसके अपने घरेलू कारण भी शामिल होते हैं।”

 

शानदार व्यक्तित्व के मालिक 60 वर्षीय थरूर ने अपनी आगामी साहित्यिक कृति के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा, “यह किताब (एन एरा ऑफ डार्कनेस) अभी-अभी प्रकाशित हुई है और ब्रिटेन में दो मार्च को इसको विमोचन होगा। मेरे प्रकाशक इस बात को लेकर बहुत उत्सुक हैं कि मैंने भारत की आजादी की 70वीं वर्षगांठ पर राष्ट्र चरित्र और जनता के बारे में कुछ लिखा है।”

(आईएएनएस)

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