Special

पेड़ों को काटने के बजाय क्यों न ‘रिलोकेट’ किया जाए

नई दिल्ली: देश में शहरीकरण और विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई कोई नई बात नहीं है। पेड़ों को बचाने का मतलब है पर्यावरण को बचाना। पेड़ों को काटने का विरोध इसीलिए तो हो रहा है। ऐसे में क्यों न पेड़ों को ‘रिलोकेट’ किया जाए यानी जड़ सहित उसकी जगह बदल दी जाए। क्या यह संभव है?

हां, यह संभव है और ऐसा कर दिखाया है हैदराबाद के रहने वाले रामचंद्र अप्पारी ने। वह इसे ‘ट्री ट्रांसलोकेटिंग’ तकनीक कहते हैं और इसी तकनीक की मदद से वह हैदराबाद में अब तक 5,000 से अधिक पेड़ों को रिलोकेट कर चुके हैं।

अप्पारी की यह तकनीक पेड़ों को नया जीवन दे रही है। वह खुद कहते हैं कि दिल्ली में जिन सात कॉलोनियों के पुनर्विकास के नाम पर पेड़ों को काटे जाने पर बवाल मचा है, वहां पेड़ों को रिलोकेट किया जाए तो सारी दिक्कतें खत्म हो जाएंगी। उनकी कंपनी ‘ग्रीन मॉर्निग हॉर्टीकल्चर’ वर्ष 2010 से ही पेड़ों को रिलोकेट करने के काम में लगी है।

रामचंद्र अप्पारी (38) कहते हैं, “यदि हमें शहरीकरण के लिए पेड़ों को हटाना है, तो काटने से बेहतर है कि उन्हें रिलोकेट किया जाए। हम आठ साल में अब तक 5,000 पेड़ों को रिलोकेट कर चुके हैं। इसके अलावा भी पेड़ों को कटने से बचाने के लए कई तरह की परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं।”

आपने यह तकनीक कैसे ईजाद की? यह पूछने पर अप्पारी ने आईएएनएस से कहा, “साल 2008 की बात है, उस समय हैदराबाद में सड़कों को चौड़ा करने के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटा गया। यह देखकर मुझसे रहा न गया। उसी समय मैंने सोचा, काश! काटने के बजाय अगर पेड़ों को जड़ सहित दूसरी जगह ले जाया जाए, तो कितना अच्छा रहेगा। मैंने आस्ट्रेलिया में रह रहे अपने एक दोस्त की मदद से पेड़ों को रिलोकेट किए जाने के बारे में रिसर्च किया और उसके बाद इस कॉन्सेप्ट पर काम करना शुरू कर दिया।”

उन्होंगे कहा, “दरअसल, ट्री ट्रांसलोकेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत पेड़ों को जड़ सहित एक जगह से हटाकर दूसरी जगह पर लगाया जाता है। हमने हैदराबाद मेट्रो परियोजना के दौरान बड़े पैमाने पर पेड़ों का ट्रांसलोकेशन किया था। हमने उस दौरान 800 पेड़ों को रिलोकेट किया।”

कृषि विज्ञान में मास्टर और एग्री बिजनेस में एमबीए डिग्रीधारक रामचंद्र अप्पारी ने आगे कहा, “हम अब तक 7,000 से ज्यादा पेड़ों को नया जीवन दे चुके हैं। इस दौरान काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। पेड़ के चारों ओर एक मीटर के दायरे में तीन फीट गड्ढा खोदा जाता है और पेड़ को जड़ सहित निकालकर दूसरी जगह ले जाकर लगाया जाता है। इस दौरान पेड़ की जड़ों पर ‘रूट प्रमोटिंग हार्वेस्ट’ केमिकल लगाया जाता है, ताकि पेड़ अपनी नई जगह पर पल-बढ़ सके।”

एक पेड़ को रिलोकेट करने में कितनी लागत आती है? इस सवाल पर अप्पारी ने कहा, “एक पेड़ को शिफ्ट करने की लागत उसके आकार, एक स्थान से दूसरे स्थान के बीच की दूरी जैसे कारकों पर निर्भर करती है। अमूमन इसमें 10,000 से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक खर्च आता है।”

रामचंद्र ने ‘ग्रीन मॉर्निग हॉर्टीकल्चर’ की स्थापना वर्ष 2010 में की थी और तब से कंपनी का टर्नओवर लगातार बढ़ रहा है। कंपनी की वेबसाइट से प्राप्त सूचना के मुताबिक, वर्ष 2017 में कंपनी का टर्नओवर 2.5 करोड़ रुपये रहा।

मौजूदा समय में दिल्ली में पेड़ों की कटाई को लेकर मची खींचतान पर अप्पारी कहते हैं, “पेड़ों को रिलोकेट करने को लेकर जागरूकता की कमी है। इसे गंभीरता से लेना होगा और दिल्ली ही क्यों, देशभर में पेड़ों को रिलोकेट किया जा सकता है। पेड़ों को काटने की जरूरत ही नहीं है, प्रशासन पेड़ों को रिलोकेट करने को लेकर टेंडर निकाले और इस तकनीक को बढ़ावा दे। इसका विरोध भी नहीं होगा और पर्यावरण को नुकसान भी नहीं पहुंचेगा।”

–आईएएनएस

Show More
Close

Adblock Detected

Please consider supporting us by disabling your ad blocker