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4 साल में विकास के नाम पर गंगा का विनाश

गंगा के संरक्षण, प्रबंधन में अनदेखी और देरी करने वाले को जेल हो, क्योंकि पिछले चार साल में विकास के नाम पर गंगा के लिए काम के नाम पर गंगा का विनाश हुआ है। गंगा के प्रवाह को समझे बिना गंगा के किनारों पर जो घाट बने हैं, उनसे गंगा के प्रवाह में बाधाएं पैदा हुई हैं।

जल-शोधन के नाम पर बन रहे शोधन संयंत्रों में मल-जल को पहुंचाने की ठीक व्यवस्था नहीं होने के कारण वह पूर्वत: ही गंगा जी में जाता है। एक तरफ संयंत्र बनाने, दूसरी तरफ पाइप लाइन बिछाने और तीसरी तरफ संयंत्र को चलाने वाली व्यवस्था पर जो खर्च होता है, उसको उठाने के लिए स्थानीय तंत्र तैयार नहीं होता, उसमें बहुत भयानक भ्रष्टाचार है, इसलिए शोधन हुए बिना दूषित जल गंगा जी में मिलता रहता है। इसीलिए गंगा जी पहले से भी ज्यादा प्रदूषित हो गई हैं।

गंगा जी के काम में भ्रष्टाचार बढ़ा है। गंगा निर्मल बनाने का काम देश के बड़े राजनेताओं को अब ‘असंभव’ जैसा लगने लगा है, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले अपनी मुख्य घोषणाओं में घोषित किया था, जिनमें गंगा जी को अविरल-निर्मल बनाना शामिल था।

गंगा में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, इसलिए अब उन्होंने गंगा का नाम लेना भी बंद कर दिया है। गंगा जी दिन-ब-दिन और ज्यादा दूषित होती जा रही है। गंगा जी का बीओडी और सीओडी का लेवल बढ़ गया है। उसको ठीक करने के लिए एक समर्पित प्रधानमंत्री चाहिए जो गंगा के लिए समग्र रूप से समर्पित हो।

सन् 2014 में गंगा के लिए सबसे ज्यादा समर्पित और सक्षम व्यक्ति नरेंद्र मोदी दिखते थे, लेकिन चार वर्ष बीत जाने के बाद यह बात ‘झूठी’ हो गई है। अब हमें गंगा जी के लिए प्रो. जी.डी. अग्रवाल जैसा सक्षम और समर्पित व्यक्ति चाहिए, वही गंगा को निर्मल बनाने का विज्ञान समझते हैं तथा गंगा के संस्कृतिक आध्यात्मिक पहलू को भी जानते हैं। वे ही गंगा की अविरलता और निर्मलता के विज्ञान को जानते हैं, इन दोनों संबंधों को समझे बिना गंगा की चिकित्सा नहीं हो सकती।

गंगा नदी दुनिया की दूसरी नदियों से अलग विशिष्टताओं वाली नदी है। गंगाजल विशिष्ट है, यह सिद्ध करने वाले सैकड़ों शोध आधुनिक भारत में हो चुके हैं। जैसे कानपुर से 20 किलोमीटर ऊपर बिठूर से लिए गंगाजल में कॉलिफॉर्म नष्ट करने की विलक्षण शक्ति मौजूद है, जो कानपुर के जल आपूर्ति कुएं में आधी रह जाती है, और यहां के भूजल में यह शक्ति शून्य हो जाती है। यह गंगाजल में मौजूद सूक्ष्मकणों (बायोफाज्म) के कारण हैं।

हरिद्वार के गंगाजल में बीओडी को नष्ट करने की अत्याधिक क्षमता है। इसका क्षय करने वाले तत्वों का सामान्य जल से 16 गुना अधिक है। यह संभव है हिमालय की वनस्पति से आए अंशों के कारण। भागीरथी के जल में धातुओं के एक विशिष्ट मिश्रण से शक्ति का पता चला है। ऐसा मिश्रण संसार में अभी तक कहीं नहीं पाया गया है। जो अब टिहरी बांध से ऊपर गंगाजल में विशेष तžवों की नाशक क्षमता थी, ये सब गाद के साथ पीछे बैठ गए और बाध के नीचे आने वाले जल में कॉलिफॉर्म नाशक या सड़न नाशक क्षमता शून्य रह गई है।

अभी वर्ष 2017 में गंगा के डीएनए विश्लेषण से ऊपर की गंगा गाद में बीसों रोगों के रोगाणुओं को नष्ट करने की सक्षम शक्ति है। इसमें 18 रोगाणु की प्रजातियां जिनमें टीबी, हैजा, पेट की बहुत सी बीमारियां और टाइफाइड शामिल हैं। गंगाजल की ये सब विशिष्टताएं कुछ अंशों में पहले गणमुक्ते श्वर तक मिलती थी। अब गंगा जी में एक तरफ शहरों का गंदा जल और उद्योगों का रासायनिक जल मिलने लगा है, इसीलिए हरिद्वार और गढ़मुक्तेश्वर के जल में अब काफी समानताएं हो गई हैं।

केंद्रीय जल बोर्ड और जल संसाधन मंत्रालय के अधिकारी गंगाजल की विशिष्टताओं को समझकर गंगा मां का इलाज करने में सक्षम नहीं हैं। गंगा मां का प्रो. जी.डी. अग्रवाल जैसा व्यक्ति अच्छा इलाज कर सकता है। उन्हें वर्तमान सरकार अपना आदमी नहीं मान रही है, इसलिए उनसे गंगा की चिकित्सा नहीं कराना चाहती। जब मंत्री स्वयं बीमार होते हैं तो वह सबसे अच्छा चिकित्सक ढूंढते हैं, उस समय उन्हें किसी भी हॉस्पिटल में सर्वोत्तम डॉक्टर नहीं मिलता है तो कहीं से भी बुलाकर चिकित्सा करवाते हैं। तब वो अपना और पराये का भाव भूल जाते हैं।

भारत के सर्वोच्च मंत्री का इलाज एम्स में चल रहा था। ऑपरेशन करने के लिए डॉक्टर अपोलो से बुलाया गया था। ऐसा गंगा मइया के साथ नहीं हो रहा है। गंगा मइया के इलाज में ऐसा नहीं हो रहा है, गंगा मइया के हृदय के इलाज के लिए डॉक्टर तेहराम को बुलाना चाहिए, उसको न बुलाकर दांतों के डॉक्टर से गंगा मइया का इलाज कराया जा रहा है, इसीलिए गंगा की बीमारी और बढ़ती जा रही है। गंगा मइया की सही चिकित्सा नहीं हो पाई है, क्योंकि सरकारें गंगा के लिए डॉक्टर ढूढ़ते समय अपना और पराया देखते हैं।

गंगा के इलाज पर भारत सरकार का हजारांे-करोड़ रुपये बर्बाद हुआ है। कोई भी जल संशोधन संयंत्र ठीक से नहीं चल रहा है। सभी संयंत्रों के स्थान चयन में भी गड़बड़ हुई है। शायद संयंत्र स्थापन में भ्रष्टाचार हुआ है। जहां संयंत्र लग सकता है वहां घाट बनाए जा रहे हैं, घाटों का निर्माण वैज्ञानिक तरीकों से गलत है। गंगा जी के साथ पिछले चार सालों में जिन अधिकारी ने गलत काम किए हैं, उन्हें यदि जेल भेज दिया जाता तो फिर गंगा के इलाज के लिए अच्छे डॉक्टर ढूंढकर गंगा माई की चिकित्सा होती।

अधिकारियों के लिए गंगा माई नहीं कमाई है, इसीलिए अधिकारी माई से कमाई करके फल-फूल रहे हैं। एक भी अधिकारी को जेल नहीं भेजा गया। यदि ऐसे तीन अधिकारियों को भी जेल भेज दिया जाता तो गंगा जी की अविरलता-निर्मलता का ठीक दिशा में काम शुरू हो जाता।

अब गंगा जी में जहां जो काम करने की जरूरत है, वहां वह काम नहीं होता है। आज गंगा जी का सारा पैसा स्मार्ट सिटी के तहत एसटीपी बनाने और घाटों के निर्माण पर खर्च हो रहा है। यह तो शहरों का काम है, गंगा का नहीं। जो अधिकारी गंगा के पैसों को शहरों को खाने के लिए दे रहे हैं, उन्हें प्रधानमंत्री जी जेल भेजें और गंगा को अविरल-निर्मल बनाने वाले असली कामों को करने के लिए सक्षम एवं समर्पित लोगों को ढूंढ-ढूंढ कर गंगा जी के काम में लगाएं।

गंगा जी को अविरल और निर्मल बनाने के लिए पहला काम संसद में कानून पास करना है। इस कानून का प्रारूप सरकार के पास मौजूद है। इस कानून को सभी दल पारित कराने के लिए तत्पर होंगे, लेकिन भारत सरकार को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है।

गंगा कानून संसद के इसी सत्र में पेश होना चाहिए। इसका प्रारूप सरकार के पास तैयार है, मंत्रालय में, शायद मंत्रालय के अधिकारी इस प्रारूप को मंत्री जी को नहीं सौप रहे हैं तो ऐसे सभी अधिकारियों को चाहिए कि वो अपनी जिम्मेदारी समय पर पूरी करें और गंगा एवं राष्ट्र हित में अपना फर्ज निभाएं। हमारी सरकार को गंगा की संवेदनाओं को समझकर अविरलता-निर्मलता सुनिश्चित करने वाला एक शीघ्र से शीघ्र अधिनियम बनाना चाहिए तभी प्रो. जी.डी. अग्रवाल के प्राण बचेंगे।

(‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह प्रख्यात पर्यावरणविद् हैं)

–आईएएनएस

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